Khejdli Shaheed Mela. सोने से लदी खेजडली शहीदो को नमन करने पहुंची महिलाएं।

खेजड़ली मेला कब और कहां लगता है ?
उनके साथ 363 पर्यावरण प्रेमी भी शहीद हुए थे. उसके बाद यहां शहीद स्मारक में बनाया गया. अब एक मंदिर के साथ-साथ पार्क भी विकसित किया जा रहा है. हाल ही में आयोजित हुये इस मेले में बिश्नोई समाज के हजारों लोगों ने हवन में आहुतियां देकर फेरी लगाई.भरकम गहने पहनकर पहुंचती हैं.
Heavy gold jewellery is described as being "heavy." कई महिलाएं 1 से 2 किलो वजन से भी अधिक के गहने पहनकर पहुंचती हैं. इन पुश्तैनी गहनों को उनकी खानदानी निशानी के रूप में पहचाना जाता हैं।Unique Khejdli Shaheedi Fair is a celebration that takes place every year. Heavy gold jewellery is described as being "heavy." कई महिलाएं 1 से 2 किलो वजन से भी अधिक के गहने पहनकर पहुंचती हैं. इन पुश्तैनी गहनों को उनकी खानदानी निशानी के रूप में पहचाना जाता है. यह अनूठा मेला भरता है।                                              जोधपुर के खेजड़ली गांव में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले शहीदी मेले में आसपास के विश्नोई बहुल इलाकों के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण महिला और पुरुष पहुंचते हैं.।                                                                      इस मेले में आने वाली महिलाओं के गहने खास आकर्षण का केंद्र होते हैं.।  कई महिलाएं इतने भारी भरकम गहने पहनकर आती हैं।                              कि उनकी कीमत सुनकर किसी के भी होश उड़ सकते हैं।   मेले में राजस्थानी पारंपरिक परिधान में सजी-धजी बिश्नोई समाज की महिलाएं भारी भरकम स्वर्ण आभूषण पहनकर पहुंचती हैं।                                      राजस्थान के पारंपरिक और लुप्त होते गहने भी इन मेलों में देखे जा सकते हैं।  सबसे महत्वपूर्ण गले में पहने जाने वाली आड है। यह काफी वजनी होती है।यह महिला के परिवार की संपन्नता और समृद्धता निशानी भी मानी जाती है। मेले में महिला के श्रृंगार के सभी गहने देखे जा सकते हैं।यह मेला पेड़ों को बचाने की खातिर अपना बलिदान देने वाले 363 शहीदों की याद में आयोजित किया जाता है। मेले में हवन कुण्ड में आहुतियां देकर शहीदों को नमन किया जाता है। खेजड़ली शहीदी मेले में राजस्थान समेत देशभर के विश्नोई समाज के लोग शामिल होते हैं। शहीदी मेले में महिलाओं की संख्या भी बहुतायत रहती है।                                                                              वे भी अग्नि कुंड की फेरी लगाती हैं । और शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित करती हैं। अधिकांश पुरुष सफेद वस्त्र पहनकर आते हैं। खेजड़ली गांव जोधपुर के लूणी इलाके में स्थित है। विक्रम संवत 1787 में जोधपुर में राज कार्य के लिए लकड़ियों की पूर्ति के लिए तत्कालीन महाराजा के आदेशानुसार खेजडली गांव में लकड़ियां काटने गये लोगों का बिश्नोई समाज के लोगों ने विरोध किया था  लेकिन महाराजा के फरमान की पालना का हवाला देकर पेड़ काटने की शुरुआत करते ही बिश्नोई समाज के लोग पेड़ों से लिपट गये और अपनी गर्दन कटवाकर पेड़ों को बचाया खेजड़ली गांव में पर्यावरण प्रेमी अमृता देवी ने 280 वर्ष पूर्व वृक्षों की रक्षा के लिये अपना बलिदान दिया था. उनके साथ 363 पर्यावरण प्रेमी भी शहीद हुए थे. उसके बाद यहां शहीद स्मारक में बनाया गया.                      अब एक मंदिर के साथ-साथ पार्क भी विकसित किया जा रहा है. हाल ही में आयोजित हुये इस मेले में बिश्नोई समाज के हजारों लोगों ने हवन में आहुतियां देकर फेरी लगाई 30-30 लाख की ज्वेलरी पहन मेले में पहुंची महिलाएं:यहां भारी-भरकम गहने पहनने की परंपरा।                                                           जोधपुर से 2 किलोमीटर दूर खेजड़ली गांव  हर साल यहां शहीद मेला लगता है। पर्यावरण के लिए शायद ही इतनी बड़ी संख्या में शहादत का कोई उदाहरण हो पेड़ों को बचाने के लिए 363 लोगों ने अपनी जान दे दी थी। इन्हीं की याद में हर साल यह मेला लगता (भरता) है। सोमवार को यही मेला लगा और बड़ी संख्या में बिश्नोई समाज के लोग इसमें शामिल हुए।
दो साल बाद लगे इस मेले में महिलाएं आभूषणों से लक-दक नजर आईं। एक-एक महिला ने 30-30 लाख तक के गहने पहने थे। मेले की दूसरी बड़ी खासियत है- यहां महिलाएं बिना डरे लाखों रुपए का गोल्ड पहनकर पहुंचती हैं। सोमवार को भी मेले में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। 

मंजू देवी और सुनीता रिश्ते में देवरानी-जेठानी हैं। दोनों ने बताया कि वे करीब 85 तोला गोल्ड पहनकर आई हैं। मंजू देवी ने 85 तोला गोल्ड पहना है। सुनीता ने 30 तोला सोने के जेवरात पहने हैं। दोनों ने बताया कि वे हर साल इस मेले में आती हैं। यह हमारी शान है।
गुढा बिश्नोईया की मंजू व सुनीता ने बताया कि वह हर बार मेले में आती हैं। पर्यावरण को लेकर विशेष रूप से आयोजित इस मेले का उन्हें इंतजार रहता है।

खेजड़ली शहीदी मेले में बिश्नोई समाज की महिलाएं सोने के गहने पहने हुए। महिलाएं 30 लाख रुपए से ज्यादा के गहने पहनकर मेले में पहुंचीं।
मेले से जुड़े लोगों की मानें तो जेवर पहनकर आने वाली ज्यादातर महिलाएं जोधपुर संभाग से आती हैं। मेले में 20 से 25 हजार महिलाएं हिस्सा लेती हैं। सभी भारी-भरकम गहनों से लदी रहती हैं। करोड़ों रुपए के गहने पहनकर महिलाएं बेफिक्र होकर मेले में घूमती हैं।
कोरोना की वजह से दो साल से यह मेला नहीं हुआ था। महिलाएं अपने पारंपरिक ड्रेस में इस मेले में पहुंचती हैं।
मेले में महिलाएं कम से कम 25 तोले से ऊपर के वजन की आड़ महिलाओं ने पहन रखी थी। हाथों में बाजू बंध, रखड़ी, हथफूल, चूड़ी कंगन, जोधा अकबर सेट आदि ज्वेलरी पहन कर महिलाओं ने मेले में शिरकत की।
ये है इतिहास                                              खेजड़ली शहीदी मेला पूरी दुनिया में सबसे अनूठा है। काफी साल पहले अमृता देवी के नेतृत्व में 363 महिला-पुरुषों व बच्चों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। उनकी याद में यह मेला लगता है। खेजड़ली मेला जोधपुर के खेजड़ली गांव में लगता है। यह भादो की दशमी को लगता है।                            इस दिन यानी 21 सितम्बर 1730 को बिश्नोई महिला-पुरुषों ने खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा के लिए बलिदान दिया था। पेड़ों के लिए ऐसी शहादत कहीं देखने को नहीं मिलती।
बिश्नोई महिलाएं गले में सोने की आड़ पहनती हैं। यह जेवर समाज की पहचान का प्रतीक है। कम से कम 25 तोले से ऊपर के वजन की आड़ महिलाओं ने पहन रखी थी।पूरे परिवार के साथ महिलाएं परंपरागत ज्वेलरी पहनकर मेले में शामिल हुईं।
यह है मान्यता
21 सितम्बर 1730 मंगलवार का दिन था। मारवाड़ जोधपुर के महाराजा अभय सिंह नया महला बनवा रहे थे। महल निर्माण के लिए लकड़ियों को दरकार थी। महल से 24 किलोमीटर दूर खेजड़ली से पेड काटकर लाने का हुक्म हुआ। सैनिक खेजड़ली गांव में पहुंच गए। रामू खोड़ के घर के बाहर लगा खेजड़ी का पेड़ काटने लगे तो रामू की पत्नी अमृता देवी ने विरोध किया। वह पेड़ से चिपक गईं। सैनिकों ने उन्हें कुल्हाड़ी से काट दिया।
इसके बाद अमृता देवी की तीनों बेटियों आसू, रत्नी और भागू बाई भी एक-एक पेड़ को बचाने के लिए तने से लिपट गई और सैनिकों ने उन्हें भी काट दिया। यह बात पूरे गांव में फैली तो लोग खेजड़ी के पेड़ों से लिपट गए। राजा के सैनिकों ने 71 महिलाओं व 292 पुरुषों यानी कुल 363 लोगों को काट डाला।
महाराजा अभय सिंह तक यह बात पहुंची तो उन्होंने पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी और विश्नोई समाज को लिखित में वचन दिया कि मारवाड़ में कभी खेजड़ी का पेड़ नहीं काटा जाएगा। इस दिन की याद में खेजड़ली में हर साल शहीदी मेला लगता है। वन्यजीवों को बचाने में भी विश्नोई समाज हमेशा आगे रहा है। हिरणों को बचाने के प्रयास में समाज के कई लोग शिकारियों की गोली का शिकार हो चुके हैं। 
बिश्नोई समाज की महिलाएँ अक्सर गहनों का प्रयोग करती हैं, और इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
पारंपरिकता: गहनों का प्रयोग बिश्नोई समाज की पारंपरिक सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा होता है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आता है और समुदाय की विशेष पहचान का प्रतीक होता है।                                                                                     सौंदर्य और सुंदरता: बिश्नोई महिलाएँ अक्सर अपने गहनों का उपयोग सौंदर्य और सुंदरता को बढ़ावा देने के लिए करती हैं। यह उनकी सुंदरता को और भी प्रकट करता है और सामाजिक आदर्शों का पालन करता है।

धार्मिक पहचान: गहनों का प्रयोग बिश्नोई महिलाओं के लिए उनके धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा भी हो सकता है। इसके माध्यम से वे अपने धार्मिक विश्वासों को प्रतीकट करती हैं और उनकी धार्मिक पहचान को दर्शाती हैं।

संगठन और पर्यावरण में मदद: बिश्नोई महिलाएँ अक्सर अपने गहनों का प्रयोग संगठन कार्यों और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में करती हैं, और यह उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

गहनों का प्रयोग बिश्नोई महिलाओं के लिए उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, और यह उनके समुदाय की पारंपरिकता, सौंदर्य, और धार्मिक आदर्शों को प्रकट करने का एक तरीका हो सकता है।




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