जलवा पूजन कब किया जाता हैं? क्यों किया जाता हैं?कुआं पूजा करने का क्या हैं महत्व। जानिए क्या हैं ?पौराणिक कथा और करने की विधि।
जलवा पूजन कब किया जाता हैं? क्यों किया जाता हैं?कुआं पूजा करने का क्या हैं महत्व। जानिए क्या हैं ?पौराणिक कथा और करने की विधि।
jalwa Pujan Importance: हिंदू धर्म में जलवा (कुआं )पूजन की परंपरा का विशेष महत्व होता है।यह परंपरा काफी पुरानी है। सनातन हिंदू धर्म से जुड़ी परंपराएं प्रकृति और मानव को जोड़ने का कार्य करती हैं। इसलिए चंद्रमा, सूर्य, पेड़-पौधों की तरह जलवा पूजन करने का भी विधान है। हालांकि, कुएं के लुप्त होने के कारण अब यह परंपरा भी धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। लेकिन, आज भी कई जगह जलवा पूजन के बिना जन्म और विवाह जैसे संस्कार संपन्न नहीं होते। *कैसे शुरू हुई जलवा पूजन की परंपरा। कुआं पूजन की परंपरा श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि कृष्ण के जन्म के ग्यारहवें दिन माता यशोदा ने जलवा पूजा की थी। इस दिन को डोल ग्यारस के रूप में भी जाना जाता है। जलवा पूजन को ही जल यानी( कुआं पूजा) कहते हैं । शादी-विवाह में कुआं पूजनविवाह के समय जब लड़का बारात लेकर निकलता है तो मां द्वारा कुआं पूजन किया जाता है।एक सूप में मिट्टी के 2 सकोरे, सींक, अक्षत, हल्दी और बताशे आदि रखे जाते हैं. इन चीज़ों से लड़के की मां कुआं पूजन करती है ।और दूल्हा कुएं की सात बार परिक्रमा करता है। हर परिक्रमा के दौरान वह सींक को कुएं में डालता है। मां नाराज होने का नाट्य करते हुए कुएं में कूद जाने की धमकी देती है तो बेटा मां से कहता है। नाराज मत हो मां, मैं तेरे लिए बहू लाऊंगा। फिर दूल्हा एक तेल की कटोरी में अपना मुख देखता है ।और बारात लेकर निकल जाता है।इसके बाद वह पीछे मुड़कर नहीं देखता और सीधा दुल्हन लेकर ही घर लौटता है। *संतान प्राप्ति पर कुआं पूजन पुत्र प्राप्ति पर कुआं पूजन किया जाता है।हालांकि, आजकल लोग कन्या के जन्म के बाद भी कुआं पूजन करते है । जन्म के बाद जच्चा यानी बच्चे की मां द्वारा जलवा पूजन किया जाता है। इसके लिए बच्चे और मां को गुनगुने पानी से स्नान कराया जाता है। फिर नए कपड़े पहनाए जाते हैं। पूजा के लिए थाली में सुपारी, पान, आटा, बताशे, कुमकुम, अक्षत, गुड़, फल और अनाज रखे जाते हैं। बच्चे की मां या घर की बड़ी महिला माथे पर एक खाली कलश और चाकू रखती है। मंगलगीत गाते हुए महिलाएं कुआं के पास पहुंचती हैं। पूजा के लिए सबसे पहले कुएं के पास आटे और कुमकुम से स्वास्तिक बनाकर भोग लगाया जाता है। फिर पूजा की जाती है।इसके बाद प्रार्थना की जाती है। कि जिस तरह कुएं में पानी की कमी नहीं है, उसी तरह जच्चा के स्तनों में दूध की कमी न हो। * पूजन विधि: पूजा के पाटे पर पानी का कलश रखें. कलश के नीचे गेंहू रखे। कलश पर आम का पल्लव लगाएं ।उस पर पान का पत्ता रखें और फिर उस पर नारियल रखे। फिर अलग से पाटे पर पान का पत्ता रखकर उस पर सुपारी, आटे के फल रखें और हल्दी और चावल चढ़ाएं । फिर पूजन स्थान पर बच्चे व उसकी माँ को बैठाये । यह पूजा ऐसी जगह रखे जहाँ सूरज की रोशनी आती हो। लेकिन साथ ही बच्चे का मुँह ढककर रखें ताकि पूजा के दिये की लौ व सूरज की रोशनी बच्चा न देख सके। सबसे पहले कलश पर जल छिड़कें और दिये को जलाएं। हल्दी से दूसरे पाटे पर चाँद और सूरज बनाएं। घर मे जो खाना बना हो भोग के लिए निकाले फिर कण्डे की आग मे भोग लगाएं। ननद बच्चे और माँ को तिलक लगाए और कलावा बांधकर आरती उतारे. उसके बाद पाटे के चारो ओर फेरा लगाकर भगवान से बच्चे की सलामती के लिए प्रार्थना करे।भोग को चावल में मिलाकर गोले बनाकर माँ और बच्चे के ऊपर से उतारकर चारो दिशाओं में फेक दें। बची हुई खाद्य सामग्री को गौ माता को खिलायें। * बिश्नोई समाज में जलवा पूजन कैसे किया जाता हैं? बिश्नोई समाज में जलवा पूजन के समय लड़की के पीहर से उस के माता पिता के घर से तिवल ओर पीलिया लाया जाता हैं। ओर भी तीवल पहन कर लड़की अपने ससुराल कुआं से पानी भरने जाती हैं। * बिश्नोई समाज में नंनद की क्या रस्सम होती हैं ? जलवा पूजन में ननद भाभी के साथ सिर पर चावल और गुड़ की भरी परात रखकर कुआं पे साथ जाती हैं । ओर भाभी जो नन्नद को सूट या पायल जो भी कपड़े लेकर आती हैं ।वो उस परात में रख देती हैं। *बिश्नोई समाज में जलवा पूजन में भुआ की कौनसी रस्म होती हैं? बिश्नोई समाज में बुआ जलवा पूजन के बाद सभी को अपने भतीजे होने की खुशी में बतासे और गुड़ देती है। * बिश्नोई समाज में सास की कौनसी रस्म होती हैं ? बिश्नोई समाज में सास भी कुआं पूजा करवाने के लिए अपनी बहु के साथ जाती हैं । बहु की कुआं पे पूजा करवाती हैं । ओर अपने पोते की लंबी आयु की कामना करती हैं। * जलवा पूजन बच्चे के जन्म के किनते दिनो बाद कर सकते है? 11, 27, 31 इन तीनो दिनों में से किसी भी दिन जन्म लिए बच्चे का कुआँ पूजन या मूल नक्षत्र या शान्ति पूजा करवा सकते है। प्रसूता स्त्री को बच्चे के जन्म देने के 21 वे दिन या 1 महिने के बाद ही जलवा पूजन करना चाहिए। *कुआँ पूजन शुभ : दिन कुआँ पूजन के लिए शुभ दिन रविवार ,सोमवार, बुद्धवार, व शुक्रवार होते हैं।जलवा पूजन कब कैसे और क्यों किया जाता हैं। इसको करने का क्या महत्व हैं। जानें पौराणिक विधि। https://www.instagram.com/reel/CxDlUT7va9g/?igshid=MmU2YjMzNjRlOQ==https://youtu.be/Udq0yhjq1EY?si=d5fj9IUhnxpoyy8y*कुआँ पूजन शुभ मुहूर्त कुआँ/जलवा पूजन का शुभ मुहूर्त हस्त, मूल, पुष्य, अनुराधा, पुनर्वसु तथा श्रवण नक्षत्र के दौरान होता है। कुआँ पूजन शुभ तिथि कुआँ पूजन किसी भी माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी तिथि को छोड़कर शेष सभी तिथियो को किया जा सकता है।
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